- चंद्रपुर क्यों बन गया ब्लैकमेलिंग का अड्डा ?

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चंद्रपुर क्यों बन गया ब्लैकमेलिंग का अड्डा ?


■ RTI समाजसेवक व पत्रकारों की साख क्यों हो रही दागदार ?

■ RTI की बारूद का पत्रकारिता की तोप में क्यों हो रहा इस्तेमाल ?

■ सामाजिक स्वास्थ्य को कैसे तार-तार कर रहा यह गठबंधन ?

विश्लेषणात्मक लेख

@लिमेशकुमार जंगम (चंद्रपुर)

गत पखवाड़े भर में ब्लैकमेलिंग व रिश्वतखोरी के 2 अहम मामले उजागर हुए। इन दोनों मामलों में पुलिस ने सजगता से और गुप्त ढंग से कार्रवाई कर अपनी कार्यक्षमता का परिचय दिया, जो काबिले तारीफ है। लेकिन इन 2 वारदातों ने समाज में चल रही ब्लैकमेलिंग की गंदगी को बेनकाब करके रख दिया। बरसों से निरंकुश ढंग से चल रहे इस अवैध व्यवसाय का वस्त्रहरण होते ही अनेक चौंकाने वाले राज, नीतियां व व्यवस्था नग्न हो गई। इन वारदातों ने चंद्रपुर के सामाजिक स्वास्थ्य के बिगड़ने का परिचय देते हुए बिगुल बजा दिया। आखिरकार इन हालातों के निर्माण के लिये वह कौनसी परिस्थितियां जिम्मेदार है, इसका आकलन अब जनता को करना चाहिये। राजनीति व प्रशासन में पैठ जमाकर उद्योगों की खामियां खोजने की कला और चंद पत्रकारों को साथ लेकर रची जा रही रिश्वतखोरी की बिसात चिंताजनक हैं। इसके क्या दुष्परिणाम होंगे, यह चंद्रपुर के बुद्धिजीवी वर्ग को अब गंभीरता से सोचना होगा।

चंद्रपुर में कैसे जन्म हुआ ब्लैकमेलिंग की पत्रकारिता का ?

एक दौर था जब चंद्रपुर में चुनिंदा पत्रकारों के लेखन की जनता कायल थी। उनकी छत्रछाया में स्थानीय युवाओं ने पत्रकारिता के गुर सीखे। समय बदलता गया और न्यूज़ चैनलों को बिना वेतन वाले अर्थात स्टोरी बेस मानधन पाने वाले पत्रकारों की जरूरत महसूस हुई। इस खालीपन को भरने के लिये अनेक अयोग्य के हाथों में कैमरे आ गये। बूम(माइक) का धौंस और चैनलों पर वीडियो आने की नेताओं की लालसा ने पत्रकारिता के बौद्धिक चरित्र को पीछे छोड़ दिया। फिर दौर बदला तो मोबाइल हाथ में आ गये। अब हर कोई सीटिजन जर्नलिस्ट की तरह बर्ताव करने लगा। इस दौड़ में जिन्हें उपयुक्त स्थानों पर मौका मिला वे पैर जमा बैठे। जिन्हें उपयुक्त मौका नहीं मिल पाया, वे आगे के दौर में न्यूज़ पोर्टल के कर्ताधर्ता बन गये। अब न तो चरित्र की जरूरत थी और न ही टैलेंट से खबरों को परोसने की। जनता के अहम मुद्दों की लगातार अनदेखी होने लगी। कुछ तो ब्रेकिंग न्यूज के पीछे भागने लगे तो कुछ ने स्वार्थ व लाभ की कलम उठा ली। बेरोजगारों तो थी ही। लेकिन समाचार की खोज, लेखन व उसकी गंभीरता का तनीक भी ज्ञान नहीं होने के बावजूद पत्रकारिता एक उस्तरे की तरह गलत हाथों में चलती चली गई। इन्हीं हालातों में जन्म हुआ ब्लैकमेलिंग की पत्रकारिता का।

बेबसी से बेतहाशा वसूली तक कैसे पहुंच गई पत्रकारिता ?

चूंकि यह सभी जानते है कि चंद्रपुर एक औद्योगिक शहर है। उद्योगों में गड़बड़ी होना, प्रदूषण को नहीं रोक पाना, प्रशासन की लचर कार्यप्रणाली, नेताओं की उद्योगों पर पैनी पकड़ के बीच शहर में धन वर्षा ने अवैध व्यवसायों को जन्म दिया। इन अवैध कामों को अब छिपाकर चलने की बारी थी। यदि चंद्रपुर की पत्रकारिता इन अवैध कामों का लगातार पर्दाफाश करती तो शायद कोयला, रेत, तंबाकू, शराब, ड्रग्स जैसे व्यवसाय, माफिया का रूप नहीं ले पाते। पत्रकारिता यहीं चूक गई और नवसीखिये पत्रकारों ने इस मौके को लपक लिया। कलम चलाने के बजाय अवैध कामों पर धौंस जमाने लगे और चंद दिनों में बंगले व कार के मालिक बन गये। बिना समाचार लिखे जब बेतहाश वसूली मिलने लगे तो जनता के दर्दभरे समाचार लिखने में कौन समय बर्बाद करेगा ? हालात और ज्यादा तब बिगड़ने लगे जब RTI को हथियार बनाकर उद्योगों व प्रशासन की खामियों के खिलाफ जानकारियां इकठ्‌ठा करने वाले फर्जी समाजसेवक भी इसी गंदगी में डुबकी लगाने के लिये बेताब हो चले। सोने पर सुहागा की धुन जुडने लगी। RTI समाजसेवकों से इकठ्‌ठा की गई जानकारी मीडिया में प्रकाशित व प्रसारित करने या नहीं करने की नीतियां देर शाम शराब की दुकानों अथवा पत्रकारों के ठिकानों पर बैठकर तय होने लगी। इस गठबंधन का असर यह हुआ कि ब्लैकमेलिंग की मंशा रखने वाले लोग सिंडिकेटनुमा गुटों का निर्माण करने लगे। गुट कमजोर रह जाएं तो चंद रुपयों के लिये कलम चलने लगी और गुट मजबूत बन जाएं तो लाखों की उगाही होने लगी। बेबस पत्रकार चंद रुपयों के लिये तारीफ के न्यूज लिखने लगे तो बेतहाशा कमाने की मंशा रखने वाले पत्रकार व RTI समाजसेवक मिलकर लाखों की उगाही करने लगे।

क्यों व कैसे हो रहा रिश्वतखोरी का पर्दाफाश ?

कहा जाता है कि किसी भी गलत कार्य की अत्याधिकता इंसान को बर्बादी के कगार पर पहुंचा देती है। पत्रकारिता और RTI समाजसेवकों की वसूली की नीति ने अनेक व्यवसायों पर गहरी चोट की। कुछ चुप रहे तो कुछ दबे शब्दों में मुखर होने लगे। प्रताड़ितों को रिश्वतखोरी की यह नीति समझ आने लगी। ऐसे में पुलिस का सहारा लेकर मामलों को पर्दाफाश करने की हिम्मत अब समाज में बढ़ने लगी है। रिश्वतखोरी के खिलाफ बढ़ती इसी हिम्मत ने 2 ऐसे मामलों को उजागर कर दिया, जो पत्रकारिता और RTI समाजसेवा का चोला पहनकर समाज में नैतिकता के ढिंगे हांकने का काम किया करते थे। 

अब रिश्वतखोरी का नया फंडा मतलब ठेके लेना !

एक दौर था जब रिश्वतखोर खुले मुंह से धन राशि की डिमांड कर रिश्वत मांगा करते थे। लेकिन अब दौर बदल चुका है। समाज में आ रही जागृति और पकड़े जाने का डर इन्हें ज्यादा सताने लगा तो इन्होंने एक नये फंडे की खोज कर ली। उद्योगों को ब्लैकमेलिंग करते समय अब नकद राशि मांगने के बजाय अपने या अपने रिश्तेदारों के नाम से पंजीकृत फर्म के नाम पर लाखों के ठेके लेकर मुनाफे की मोठी कमाई का मार्ग इन्होंने खोज लिया है। इसलिये अब ऐसे ब्लैकमेलरों पर आयकर विभाग ही नकेल कस सकता है। अब वह दिन भी दूर नहीं जब पत्रकारों व फर्जी समाजसेवकों की अवैध संपत्ति आयकर विभाग के निशाने पर होगी।

सोचने पर मजबूर करते हैं ये 3 प्रकरण !

प्रकरण :-(1) गत 11 फरवरी के ताजे मामले में  RTI (सूचना का अधिकार कानून) के नाम पर गड़चांदूर महावितरण के उपकार्यकारी अभियंता से चंद्रपुर निवासी आरोपी सौरभ विजय बुरेवार द्वारा 10 लाख की फिरौती के लिए प्रताड़ित किया गया। एसपी को शिकायत मिलने पर आरोपी को 50,000 रुपये टोकन रकम के साथ LCB ने रंगेहाथों गिरफ्तार कर लिया।

प्रकरण :-(2) न्यूज पोर्टल न्यूज-34 के संचालक व संपादक प्रकाश हांडे के बल्लारपुर के रिपोर्टर रमेश निषाद और न्यूज नेशन व न्यूज 24 विदर्भ के रिपोर्टर प्रणित तावाडे जबरन वसूली – फिरौती मांगने के जुर्म में नामजद हो गये। बल्लारपुर पुलिस ने दोनों आरोपियों के विरोध में बीते 6 फरवरी की रात भादंवि की धारा 384, 34 के तहत अपराध दर्ज कर आरोपी रमेश निषाद को फिरौती की रकम के साथ रंगेहाथों गिरफ्तार कर लिया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि आरोपी पत्रकार उन्हें हर माह 10,000 रुपये का हफ्ता मांगने के लिये प्रताड़ित कर रहे थे। 

प्रकरण :-(3) राजुरा का यह प्रकरण भले ही कानूनी दस्तावेजों में दर्ज न हो, लेकिन इसकी चर्चा दिल दहला देने वाली है। बेहद गंभीर मामला है, क्योंकि फिरौती की रकम 10 लाख मांगने पर एक संस्था चालक को हार्टअटैक आने से उसकी मौत हो गई। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार इसके पूर्व 3 पत्रकारों ने उस संस्था चालक को ट्रैफिक ऑफिस के पास बुलवाया और अपनी कार में बिठाकर लोहारा ले गये। 10 लाख का सौदा तय हुआ। 50 हजार टोकन अमाउंट मिल गया। क्योंकि इस संस्था चालक ने नौकरी के नाम पर चंद युवाओं को ठगा था। इसके पाप की कुंडली पत्रकारों के हाथ लग गई। शहर के 18 किमी दूर एक थाने में पत्रकार पहुंचकर कार्रवाई का डर दिखाने लगे। 10 लाख की फिरौती से बचने के लिये संस्था चालक ने नागपुर एसीबी से शिकायत कर दी। लेकिन कार्रवाई होने के पूर्व तनाव के चलते उनकी हार्टअटैक से मौत हो गई। यदि यह मौत नहीं हुई होती तो चंद्रपुर के मशहूर व लाखों के भवन में ही अनेक मशहूर पत्रकारों को रंगेहाथों गिरफ्तार होना पड़ता। इस कांड में RTI समाजसेवक भी शामिल थे, यह विशेष !

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