- 1.5 लाख मीट्रिक टन सरकारी कोयला बिक रहा हैं खुले बाजार में

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1.5 लाख मीट्रिक टन सरकारी कोयला बिक रहा हैं खुले बाजार में

■ बंद वॉशरी से 9000 रुपये प्रति टन के भाव से हो रही कालाबाजारी

■  ऊर्जा संयंत्रों के कोयले को बेचकर जनरेट हो रही ब्लैक मनी

■  एमएसएमसी, महाजेनको, वेकोलि, पुलिस व आयकर विभाग की अनदेखी

@लिमेशकुमार जंगम, चंद्रपुर
महाराष्ट्र स्टेट माइनिंग कार्पोरेशन की ओर से जारी किये गये टेंडर बेनिफिकेशन(वॉश कोल) ऑफ रन ऑफ माइन कोल एंड सप्लाय ऑफ बेनिफिकेटेड कोल टू चंद्रपुर, कोराड़ी, खापरखेड़ा, नासिक, भुसावल, परली व पारस टीपीएसएस ऑफ महाजेनको 2020 में दर्ज अधिकांश शर्तों व नियमों का धता बताते हुए बीते अनेक दिनों से राजुरा के पांढरपवनी में स्थित भाटिया कोल वाशरी में आने वाला करोड़ों का सरकारी कोयला खुले बाजार में बिक रहा है। वर्तमान में 9000 रुपये प्रति टन के भाव से यह सरकारी कोयला स्थानीय कोयला व्यापारियों को कच्ची रसीदों पर बेचा जा रहा है। जहां एक ओर महाजेनको के माध्यम से मिले कोयले के डीओ से प्राप्त उत्तम कोयले को यहां डंप कर घटिया कोयले में डोलाचार, डस्ट, मिट्‌टी व पत्थर मिलाकर, कोयले को वॉश किये बिना ही ऊर्जा संयंत्रों के लिये रेलवे रैक से भेजा जा रहा है। वहीं जीएसटी डूबाने, सरकारी कोयले को ऊंचे दामों पर बेचने, ब्लैक मनी जनरेट करने के इस खेल में करोड़ों का काला खेल खेला जा रहा है। इसके बावजूद एमएसएमसी विभाग, महाजेनको, वेकोलि, पुलिस विभाग एवं आयकर विभाग का इस संगठित अपराध की ओर ध्यान नहीं है।

कोल डीओ नंबर-1110002952, तो लोकल ट्रकों में क्यों भर रहे कोयला ?

महाराष्ट्र स्टेट पॉवर जनरेशन कंपनी का भुसावल टीपी का डीओ नंबर-1110002952 डेढ़ लाख टन कोयला जिसको वॉशरी में वॉश कर रेलवे रैक के माध्यम से भुसावल पावर प्लांट को भेजना है। वह कोयला राजुरा के पांढरपवनी स्थित भाटिया वॉशरी में खाली किया जा रहा है। और उसी कोयले को छांटकर उत्तम व बड़े साइज के कोयले को खुले बाजार में 9000 रुपये प्रति टन के भाव से बेचा जा रहा है। इस खुले बाजार में कोयले की कालाबाजारी के लिये न तो कोई पुख्ता पर्ची या रसीदें तैयार की जा रही है और न ही इस करोड़ों के सरकारी कोयले की चोरी पर किसी विभाग का नियंत्रण है। सीधे तौर पर जहां कच्चे बिलों पर चल रही कोयले की कालाबाजारी जीएसटी पर गहरी चोट कर रही है। बावजूद आयकर विभाग का इस समस्या की ओर ध्यान नहीं है।

रुकमयी की काली नगरी में करोड़ों की काली कमाई कैसे ?

रुकमयी कोल वाशरी एलएलपी को यह ठेका हाल ही में मिला। इसके बाद रुकमयी ने इस ठेके को चलाने के लिये महामिनरल मायनिंग एंड बेनिफिकेशन प्राइवेट लिमीटेड के वणी तहसील के कलमना स्थित कोल वाशरीज को किराया से ले लिया। लेकिन इस वॉशरी की क्षमता एमपीसीबी के दस्तावेजों में महज 12 प्रतिशत भी नहीं हैं। क्योंकि महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल के 6 जून 2021 के पत्र के अनुसार महामिनरल मायनिंग एंड बेनिफिकेशन प्राइवेट लिमीटेड, कलमना, वणी को वॉश करने की सालाना क्षमता 1 लाख 80 हजार टन मात्र है। और शर्त के अनुसार इन्हें 15 लाख मीट्रिक टन वॉश करने व परिवहन करने का अनुभव अनिवार्य रूप से मांगा गया था। 

विमला के बाद अब रुकमयी क्यों बन गई काले खेल की संजीवनी ?

कोयला खदानों से महाजेनको को वॉश कर भेजा जाने वाला कोयला सीधे खदानों से चलकर विमला रेलवे साइडिंग पर पहुंच रहा था। यह किसी भी वॉशरीज में वॉश न करते हुए सीधे तौर पर महाजेनको को ज्यो का त्यो अथवा घटिया कोयला, डोलाचार, डस्ट, मिट्‌टी, पत्थर आदि की मिलावट कर पहुंचाया जा रहा था। अर्थात वॉशरीज के लिये महाजेनको की ओर से की जा रही कवायद बिजली उत्पादन की गुणवत्ता को बढ़ाने में वॉश कोल का जो अहम हिस्सा होना चाहिये था, उसे ही नजरअंदाज कर सीधे खदानों का व घटिया कोयला पहुंचाने के कारण कोल वॉश की जरूरत व अहमियत को यहां समाप्त कर दिया गया। जबकि यह खेल अब इसी रुकमयी कंपनी के संचालकों द्वारा राजुरा के भाटिया कोल वॉशरी में खेला जा रहा है। 

सरकारी कोयला करोड़पति व्यापारियों की जागिर कैसे ?

रुकमयी कोल वाशरी एलएलपी में संचालक के तौर पर रणजीत सिंह छाबडा, इशपाल सिंह भाटिया, नितीन उपरे, संदीप अग्रवाल, शामसुंदर मित्तल, संजय हरदवानी और नरेंद्र सिंह कोहली का समावेश है। जो कोयला खदानों से वॉशरीज को जाना चाहिये था, वह कोयला चंद्रपुर, वणी, नागपुर के प्रतिष्ठित कोयला व्यपारी जीतेश अग्रवाल, प्रकाश अग्रवाल, सुनील भट्‌टड़, कैलाश अग्रवाल, शैलेंद्र अग्रवाल आदि रॉ कोल के नाम पर उत्तम व बड़े साइज का कोयला उठाकर अपनी-अपनी पार्टियों को बेच रहे हैं। इससे सरकार को करोड़ों को चूना लग रहा है।

एमआईडीसी व उद्योगों का डोलाचार कहां गायब हुआ ?

चंद्रपुर के सारे स्पंज आयरन प्लांट, एमआईडीसी घुग्घुस, चंद्रपुर के डोलाचार और ईएसपी डस्ट लाखों टन कहां चली गई, इसका जवाब किसी भी प्लांट के प्रबंधन के पास नहीं है। बीते महीनों में कई नेताओं ने यह मुद्दा उठाकर अपनी रोटियां सेंक ली। वहीं सरकार का कोयला यहां के कोयला माफिया मिलीभगत कर खुले बाजार में बेच रहे हैं। इस पूरे मामले में जहां एमएसएमसी के अफसर आंखों पर पट्‌टी बांधे बैठे हैं। इसके चलते ऊर्जा संयंत्रों की बिजली गुणवत्ता भी बढ़ने के बजाय लगातार घट रही है। कोयला आपूर्ति के इस भ्रष्ट खेल में ब्लैक मनी निर्माण हो रहा है। इसलिये आयकर विभाग को इस पूरे मामले पर गंभीरता से सोचना होगा।

नेताओं व अफसरों के हाथ काले तो नहीं ?

सरकारी कोयले की कालाबाजारी के इस मुद्दे पर 14 फरवरी 2022 को एमएसएसी के प्रबंध निदेशक को लिखित शिकायत की गई। इसकी प्रतियां यवतमाल के जिला पुलिस अधीक्षक, उपविभागीय पुलिस अधिकारी वणी, पुलिस निरीक्षक वणी आदि को भेजी गई। इसके बावजूद बीते सप्ताह भर में इन विभाग के कानों पर जूं तक नहीं रेंग पाई है। सरकारी संपत्ति को बेतहाशा हो रहा दोहन और कोयले की बेहिसाब कालाबाजारी पर कोई दखल नहीं ले पा रहा है। राजनेता हो या प्रशासन के अफसर, कोयले की इस कालाबाजारी में अपने हाथ काले करने की बू अब आने लगी है।

वाशरी है या उत्तम कोयले को घटिया बनाने का डंपिंग यार्ड ?

राजुरा के पांढरपवनी में स्थित भाटिया कोल वाशरी में कहीं भी कोयले को वॉश नहीं किया जा रहा है। बल्कि इस भूमि का उपयोग केवल डंपिग यार्ड की तरह कोयला डंप करने और उसे छांटकर उत्तम कोयले को बाजार में बेचने की नीति पर बीते अनेक दिनों से काम चल रहा है।

 


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